देहरादून। राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी मन्जू बहन ने कहा कि श्रेष्ठ जीवन निर्माण में धर्म के नीति नियम भी उपयोगी सिग्नल है। उन्हें तोड़ने से अपराध होते हैं। उनका यह भी कहना था कि धर्मभ्रष्टता ही धर्मनष्ट होने की स्थिति का पूर्व संकेत देती है।
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के स्थानीय सेवाकेन्द्र सुभाष नगर देहरादून के सभागार में आयोजित सत्संग में ”धर्मभ्रष्ट से धर्मनष्ट” विषय पर चर्चा करते हुए राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी मन्जू बहन ने कहा कि जैसे सड़क पर चलने वाले वाहनों के लिए टैªफिक सिग्नल को मानना महत्वपूर्ण है, न मानने से दुर्घटना होती है ऐसे ही धर्म के नीति नियम भी श्रेष्ठ जीवन निर्माण में उपयोगी सिग्नल है। उन्हें तोड़ने से अपराध होते हैं। उनका कहना था कि विश्व के वर्तमान से सिद्ध है कि धर्म अपने मूल ध्येय से विचलित होता जा रहा है। हर धर्म में अनेक सम्प्रदाय, मठ, पंथ बन गये हैं। परिणाम स्वरूप मत-भेद पनप रहा है। उन्होंने कहा कि धर्म एक साधन है आत्मशुद्धि और परमात्मा की प्राप्ति काए परन्तु धर्म के नाम पर धर्मांधता और धर्म जुनून की जो अति हो रही है उससे तो धर्मभ्रष्ट-कर्मभ्रष्ट समाज का स्पष्ट दर्शन हो रहा है। इसी कारण से आज युवा पीड़ी धर्मविमुख हो पथभ्रष्ट हो रही है।
बहन जी ने कहा कि धर्म अर्थात गुणो को धारण करना। धर्म को मानते तो हैं परन्तु उसको आचरण में नहीं लाते। संसार तो अनादि काल से चलता आ रहा है और चलता ही रहेगा लेकिन मूल तथ्यों से भटक जाना ही भ्रष्ट होना कहा जाता है। उन्होंने कहा कि धर्मभ्रष्टता ही धर्मनष्ट होने की स्थिति का पूर्व संकेत देती है। कोई भी चीज़ श्रेष्ठ से भ्रष्ट बनती है और आखिर नष्ट हो जाती है। उनका कहना था कि धर्म का सम्बन्ध आत्मा से है, स्थूल शरीर से नहीं। आत्मधर्म आत्मा के मूल गुणों के प्रति ही ध्यान खिंचवाता है। अपने अनादि, शुद्ध, सत्व, पवित्र गुणों का स्वरूप बनना ही धर्माचरण कहा जाता है जो कि राजयोग से ही प्राप्त हो सकते हैं। इस अवसर पर राजेश, गंगा भाई, सुरेन्द्र, निधि, पुष्पा बिष्ट, रेनू तथा अन्य मौजूद थे।