देहरादून (गढ़वाल का विकास न्यूज)। व्यर्थ बोल, जो किसी को भी अच्छे नहीं लगते, उन्हें समाप्त करें। बात होती है दो शब्दों की, लेकिन उसे लम्बा करके बोलते रहना, यह भी व्यर्थ है। जो काम चार शब्दों में हो सकता है, वह 12-15 शब्दों में बोलने से लाभ के बजाय हानि होती है। यह कहना है राजयोगिनी ब्रह्मकुमारी मंजू बहन का।
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के स्थानीय सेवाकेन्द्र सुभाष नगर देहरादून के सभागार में सत्संग में राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी मंजू बहन ने उपस्थित जनसभा को बोल का महत्व समझाया। इस दौरान उन्होंने एक स्लोगन सदा गले में डाल के रखने को दिया –
कम बोलो, धीरे बोलो, मीठा बोलो, सोच कर बोलो और सम्मान से बोलो। व्यर्थ वा डिस्टर्ब करने वाले बोल से मुक्त बनेंगे तो जीवन में, संबंधों में, कार्य व्यवहार में तथा परिवार-समाज में मधुरता बनी रहेगी। उन्होंने कहा कि व्यर्थ बोल को समाप्त करने के लिये अन्तर्मुखता का गुण विशेष रूप से सहायक है जो संकल्पों पर नियंत्रण लाता है और उन्हें सही दिशा देता है। अन्तर्मुखता राजयोग के अभ्यास से सहज आ जाती है।
राजयोगिनी ब्रह्मकुमारी मंजू बहन ने कहा कि राजयोग अभ्यास का आरंभ स्वयं को आत्मा समझने से होता है। आत्म भान से देह का अभिमान, देह के संबंध, पदार्थ, दुनिया, सभी से उपराम होने में मदद मिलती है। फिर परमात्मा के सत्य परिचय को जान, उनसे अपने सर्व संबंध जोड़ना आसान हो जाता है। हमें सर्व प्राप्तियाँ तो परमात्मा से ही होती हैं। जहाँ सर्व संबंध हों, सर्व प्राप्तियाँ हों, वहाँ परमात्मा की याद कहो या परमात्मा से योग कहो, वह सहज और सदा का हो जाता है।
राजयोगिनी ब्रह्मकुमारी मंजू बहन ने कहा कि जिस मन में परमात्मा बाप हो, वहाँ पाप नहीं हो सकता। जिसका सर्वसमर्थ (परमात्मा) साथी हो, वहाँ व्यर्थ ठहर नहीं सकता। और जहाँ व्यर्थ संकल्प, बोल अथवा कर्म न हों, वहाँ समय, शक्ति, साधन, हर चीज़ की बचत और वृद्धि होती है। इस अवसर पर शिखा, मुस्कान, प्रदीप, राकेश, हार्दिक, सुलक्षणा, निर्मला, दीपक, रेणू, उमेश तथा अन्य मौजूद थे।